पिछले दिनों जब मेरा मित्र जीवन सपरिवार यहां आया था। दो दिन वे लोग यहां रहे मगर मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसका दो साल का बेटा अमित कुछ भी नहीं खाता था कुछ मूड बन गया तो थोड़ा सा लिया अथवा दूध पी लिया अन्यथा ना-ना करते रहता।

मुझे मेरे दोनों बच्चों तृप्ति और टीसू के बड़े होते खाने पीने में कोई परेशानी नहीं हुई। दोनों बड़े चाव से सभी चीज खाते हैं चाहे खटटा अचार अथवा टमाटर हो, दाल, दूध, रोटी हो या खीर। हां, जब तृप्ति छः माह की थी तभी भैया – भाभी जो दोनों डॉक्टर हैं, यहां आये थे, उनके कहे अनुसार धीरे-धीरे बेबी फूड, गाय का दूध और केला जैसे फल देना शुरू किया बाद में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन जीवन ने बताया हमारा अमित शुरू से कुछ खाता नहीं मूड होने पर कुछ खा लेता है अन्यथा नहीं।
अधिकांश माताएं बच्चे के खाने में अनयिमितता या मूडीपन से परेशान रहती हैं इस परेशानी से दूर करने के लिये कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। अगर बच्चा खाने में मूडी होते हुये भी स्वस्थ है और उसका शारीरिक विकास उचित ढंग से हो रहा है तो परेशान होने की कोई बात नहीं है। क्योंकि स्वस्थ रहने के लिये ज्यादा खाना आवश्यक नहीं होता लेकिन अगर आपका बच्चा खाने में अनियमित होने के साथ-साथ शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं है तो यह जरूर विचारणीय प्रश्न है। उसे खाने के लिये जरूरी नहीं है कि उस पर दबाव डाला जाये या मारा पीटा जाये बल्कि कुछ ऐसा उपाय सोचा जाना चाहिए जिससे बच्चें की प्रवृत्ति धीरे-धीरे खाने की ओर बढ़े। 
जब बच्चे साल भर के होते हैं तो उसे जो भी खिलाया पिलाया जाता है उसे वे खा लेते हैं कभी-कभी खाते अथवा खाने से अपच अथवा उल्टी जैसे शिकायत होती है। यह बढ़ाना चाहिये जब बच्चे दो साल के होते हैं तो उसका मूड बदलने लगता है इस समय बच्चे किसी भी बर्तन को जो उन्हें पसंद होता है उसे यह मेरा है, और उसी में खाना-पीना चाहते हैं। अपनी साईकिल, कुर्सी आदि में किसी को वह बैठने नहीं देते अर्थात् वह अपनी पंसद और नापंसद को हां या ना में व्यक्त करने लगता है लगभग चार और पांच साल के बच्चे खाते कम है और खाने को पंसद नापंसद ज्यादा करते हैं। 
सामान्य तौर पर यह देखा गया है कि जब मम्मी खाना बना रही हो तो उसके साथ आटे की लोई बना कर खेलने और दादा-दादी, चाचा, बुआ, पापा के साथ बैठकर भोजन करना ज्यादा पंसद करते हैं। वे चाहते है कि जैसे सबकी थाली लगाई जा रही है उसी तरह उसकी भी थाली लगाई जाये।
छोटे बच्चे खेलते हुये खाना पंसद करते हैं। जैसे केले को उंगलियों से मसलना, दाल, चावल को इधर उधर गिराना आधा मुंह में डालना आधा जमीन में गिराना इस प्रकार वह अपनी इच्छानुसार खाते हैं और देखते हैं कि वह क्या खा रहा है। ऐसे में उन्हें रोकना टोकना नहीं चाहिये बल्कि खाने के समय उन्हें स्वतंत्र रूप से खाने एवं गिराने देना चाहिये धीर-धीरे बड़ों का खाते देखकर सब ठीक हो जाता है।
यद्यपि यह कहना बहुत कठिन है कि बच्चे को कितना खाना खिलाना चाहिये। लेकिन इतना ख्याल अवश्य रखना चाहिये कि बच्चे को जितना खाना दिया जा रहा है उससे प्रोटिन की मात्रा पर्याप्त मिल रही है या नहीं। एक संतुलित आहार के लिये प्रतिदिन दूध, मक्खन, पनीर, ब्रेड, अनाज, फल आदि लिया जाना चाहिये क्योंकि एक साल के बच्चे को दिन भर में 1000 कैलोरी उर्जा की आवश्यकता होती है और 420 से 600 कैलोरी प्रतिवर्ष के हिसाब से साल वर्ष की उम्र तक बढ़ती जाती है उसके बाद उर्जा स्थिर हो जाती है अतः बच्चे को उनकी उम्र के हिसाब से भोजन देना चाहिये और भोजन की मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाते जाना चाहिये। 
बच्चों से यह कतई उम्मीद न करें कि वह बड़ों के समान सभी चीजें खायेंगे। उन्हें उनकी इच्छानुसार ही खाने दे परन्तु ध्यान रखें कि उनके खाने में पौष्टिक तत्व मौजूद हों कभी-कभी बच्चे किसी एक चीज को अथवा सभी चीजों को ज्यादा लेना चाहते है। ऐसा तब होता है जब उन्हें लगने लगता है कि मम्मी उसे कम खाना देती है।
अगर कोई चीज आपके बच्चे को अधिक पसंद आये और उसे बार-बार मांगे तो अवश्य दें मगर यह भी ख्याल रखें कि उसके खाने से स्वास्थय में प्रतिकूल प्रभाव न पड़े ऐसी स्थिति में दूसरी चीज खाने के लिये दबाव न डाले जबरदस्ती और अनावश्यक दबाव से बच्चे उसे कभी पंसद नहीं करेगा। प्रायः ऐसा होता है कि बच्चा एक बार किसी चीज को खाने से इंकार कर देता है तो हम उसे दुबारा खाने के लिये नहीं देते यह सोचकर कि बच्चा इसे खाता ही नहीं बल्कि उसे दूसरी चीजों के साथ देना चाहिये, बच्चे को आप विश्वास दिलाये कि आप जो चीज उन्हें खाने दे रही है वह स्वादिष्ट है बच्चे के खाने के समय का भी ध्यान रखें और विभिन्न स्वादों के व्यंजन खाने को दे, दूसरा तरीका यह है कि जो चीज बच्चे पसंद नहीं है उसे छिपाकर दूसरे खाने की चीजों को साथ दिया जा सकता है।
आज समस्या है कि माता-पिता अपने बच्चों से खाने पीने के संबंध में ज्यादा उम्मीद रखते हैं ऐसा प्रायः हर अभिभावकों के साथ होता है अपनी इस उम्मीद को पूरा करने के लिये वे बच्चों को अधिक खिलाने का प्रयत्न करते है अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण वे परेशानी में पड़ जाते हैं क्योंकि अधिक खाने से अनेक बिमारियों की संभावना रहती है इसलिये बेहतर यही होगा कि बच्चे को उसकी इच्छानुसार ही खाने दें अनावश्यक और जबरदस्ती न करें क्योंकि शांतिपूर्ण अनावश्यक में प्रसन्न चित से खाया गया भोजन ही शरीर में लगता है अतः बच्चों के मूड को देखकर वैसा खाना खिलाये।
रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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