श्री कृष्ण जी प्रेम के बारे में कहते है – Shree Krishan Ji prem ke baare me kahte hai

Shree Krishna Ji says about love. श्री कृष्ण जी प्रेम के बारे में कहते है – Shree Krishan Ji prem ke baare me kahte hai.

प्रिय मित्र आज इस पोस्ट में हम भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारा बताए गए प्रेम के रहस्य के बारे में पढ़ेंगे. श्रीमद भगवत कथा में श्री कृष्ण स्वयं
प्रेम के विषय क्या कहते है आइये जानकारी लेते है.

श्री कृष्ण जी कहते है की यदि हम केवल उसी से प्रेम करते है जो हम से प्रेम करता है तो उस प्रेम में स्वार्थ छिपा है. यह तो केवल लेना का देना है. लेकिन यदि हम उससे प्रेम करते है जो हमें प्रेम नहीं करता तो वह निस्वार्थ प्रेम है. जैसे स्वभाव से ही करुणाशील सज्जन और माता पिता हमसे प्रेम करते है. उनका ह्रदय
स्वभाव से ही सौहाद्र और हितैषिता से भरा रहता है और सच पूछो तो उनके
व्यवहार में निश्चल सत्य और पूर्ण धर्म भी है.

जो लोग प्रेम करने
वालों से भी प्रेम नहीं करते है वो प्रेम ना करने वालों से प्रेम करें यह तो बिलकुल ही नामुमकिन है. इस तरह के लोगो को चार भागो में बाँटा जा सकता है जो निम्नलिखित है:-

  1. जो अपने स्वरुप में मस्त रहते हैं.
  2. जो केवल सेक्स को ही प्रेम मानते है. 
  3. जो जानते ही नहीं की हमसे कौन प्रेम करता है. 
  4. जो जानबूझ कर अपना हित करने वाले को सताना चाहते हैं.
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आगे श्री कृष्ण गोपियों से कहते हैं:-

मैं तो प्रेम करने वालों से भी प्रेम का वैसा व्यवहार नहीं करता, जैसा की
करना चाहिए. मैं ऐसा केवल इसीलिए करता हूँ की उनकी चित्त वृत्ति और भी
मुझमे लगे, निरंतर लगी ही रहे. जैसे निर्धन पुरुष को कभी बहुत सा धन मिल
जाये और फिर खो जाये तो उसका ह्रदय खोये हुए धन की चिंता से भर जाता है,
ऐसे ही मैं भी अपने प्रेमियों से मिलकर भी छिप जाता हूँ. 

इसमें संदेह नहीं है की तुम लोगों ने मेरे लिए लोक-मर्यादा, वेदमार्ग और
अपने सगे सम्बन्धियों को भी छोड़ दिया है. ऐसे में तुम्हारी
मनोवृत्ति और कहीं न जाये, अपने सौंदर्य और सुहाग की चिंता न करने लगे,
मुझमे ही लगी रहे. इसीलिए परोक्ष रूप से तुम लोगों से प्रेम करता हुआ ही
मैं छुप जाता हूँ. इसीलिए तुम लोग मेरे प्रेम में दोष न निकालो. तुम सब
मेरी प्यारी हो और मैं तुम्हारा प्यारा हूँ. 

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तुमने मेरे लिए घर गृहस्ती की उन बेड़ियों को तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े
बड़े योगी भी नहीं तोड़ पाते. मुझसे तुम्हारा ये मिलन, यह आत्मिक संयोग
सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है. यदि मैं अमर शरीर से, अमर जीवन से
अंनत काल तक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ तो भी
नहीं चूका सकता. मैं जन्म – जन्मों तक तुम्हारा ऋणी हूँ. तुम अपने सौम्य
स्वभाव से, प्रेम से मुझे उऋण (ऋण मुक्त) कर सकती हो परन्तु मैं तो
तुम्हारा ऋणी ही रहूँगा.


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