दूब के कुछ औषधीय गुण Dub ke kuchh aushdhiy gun

दूब के कुछ औषधीय गुण Dub ke kuchh aushdhiy gun, Medicinal properties of grass.
दूब या ‘दूर्वा’ जिसका वैज्ञानिक नाम है साइनोडान डेक्टीलान। यह वर्ष भर पाई जाने
वाली घास है, जो ज़मीन पर पसरते हुए या फैलते हुए बढती है। 

हालांकि यह एक खरपतवार है परन्तु हिन्दू धर्म में
इस घास को बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हिन्दू संस्कारों एवं
कर्मकाण्डों में इसका उपयोग बहुत किया जाता है। इसके नए पौधे बीजों तथा
भूमिगत तनों से पैदा होते हैं। वर्षा काल में दूब घास अधिक वृद्धि करती है
तथा वर्ष में दो बार सितम्बर-अक्टूबर और फ़रवरी-मार्च में इसमें फूल आते
है। दूब सम्पूर्ण भारत में पाई जाती है। यह घास औषधि के रूप में विशेष तौर पर प्रयोग की जाती है।
महाकवि तुलसीदास ने दूब को अपनी लेखनी से इस प्रकार सम्मान दिया है-
“रामं दुर्वादल श्यामं, पद्माक्षं पीतवाससा।”
प्रायः जो वस्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर सिद्ध होती थी, उसे हमारे
पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसका महत्व और भी बढ़ा दिया। दूब भी ऐसी ही
वस्तु है। यह सारे देश में बहुतायत के साथ हर मौसम में उपलब्ध रहती है।
दूब का पौधा एक बार जहाँ जम जाता है, वहाँ से इसे नष्ट करना बड़ा मुश्किल
होता है। इसकी जड़ें बहुत ही गहरी पनपती हैं। दूब की जड़ों में हवा तथा
भूमि से नमी खींचने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यही कारण है कि चाहे
जितनी सर्दी पड़ती रहे या जेठ की तपती दुपहरी हो, इन सबका दूब पर असर नहीं
होता और यह अक्षुण्ण बनी रहती है।
दूब को संस्कृत में
‘दूर्वा’, ‘अमृता’, ‘अनंता’, ‘गौरी’, ‘महौषधि’, ‘शतपर्वा’, ‘भार्गवी’
इत्यादि नामों से जानते हैं। दूब घास पर उषा काल में जमी हुई ओस की बूँदें
मोतियों-सी चमकती प्रतीत होती हैं। ब्रह्म मुहूर्त में हरी-हरी ओस से
परिपूर्ण दूब पर भ्रमण करने का अपना निराला ही आनंद होता है। पशुओं के लिए
ही नहीं अपितु मनुष्यों के लिए भी पूर्ण पौष्टिक आहार है दूब। महाराणा
प्रताप ने वनों में भटकते हुए जिस घास की रोटियाँ खाई थीं, वह भी दूब से ही
निर्मित थी। अर्वाचीन विश्लेषकों ने भी परीक्षणों के उपरांत यह सिद्ध किया
है कि दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। दूब
के पौधे की जड़ें, तना, पत्तियाँ इन सभी का चिकित्सा क्षेत्र में भी अपना
विशिष्ट महत्व है। आयुर्वेद में दूब में उपस्थित अनेक औषधीय गुणों के कारण
दूब को ‘महौषधि’ में कहा गया है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद
कसैला-मीठा होता है। विभिन्न पैत्तिक एवं कफज विकारों के शमन में दूब का
निरापद प्रयोग किया जाता है। दूब के कुछ औषधीय गुण निम्नलिखित हैं:
  • संथाल जाति के लोग दूब को पीसकर फटी हुई बिवाइयों पर इसका लेप करके लाभ प्राप्त करते हैं। 
  • इस पर सुबह के समय नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है और अनेक विकार शांत हो जाते है।
  • दूब घास शीतल और पित्त को शांत करने वाली है।
  • दूब घास के रस को हरा रक्त कहा जाता है, इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है।
  • नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है।
  • इस घास के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले मिट जाते है।
  • दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन ठीक हो जाता है।
  • इस घास से प्राप्त रस दस्त में लाभकारी है।
  • यह रक्त स्त्राव, गर्भपात को रोकती है और गर्भाशय और गर्भ को शक्ति प्रदान करती है।
  • दूब को पीस कर दही में मिलाकर लेने से बवासीर में लाभ होता है।
  • इसके रस को तेल में पका कर लगाने से दाद, खुजली मिट जाती है।
  • दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में दो-तीन बार चटाने से मलेरिया में लाभ होता है। 
  • इसके रस में बारीक पिसा नाग केशर और छोटी इलायची मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे बच्चों को नस्य दिलाने से वे तंदुरुस्त होते है।

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